Rupashi Bharti
File Photo: Rupashi Bharti

वर्तमान समय में पिछले एक दशक से शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं, परंतु पिछले वर्ष से शिक्षा में हुए परिवर्तन सचमुच ही शोध और अन्वेषण का विषय बन गया है। पारंपरिक शिक्षा पद्धति अप डिजिटल हो चला, मास्टर साहब खड़े होकर अभिवादन के बजाय अब आभासी और डिजिटल माध्यम से गुड मॉर्निंग शब्द ने रूप ले लिया है। अध्ययन की ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था जो घर में मोबाइल या कंप्यूटर के माध्यम से पूरी हो जा रही है।

परीक्षा के क्षेत्र में अब नव प्रतिमान आया मित्र हो रहे हैं, प्रधानमंत्री जी ने अब यहां तक कह दिया है कि परिस्थिति ऐसी है कि 10वीं और 12वीं की परीक्षा अनिवार्य नहीं, बच्चों को आर्थिक मूल्यांकन के आधार पर परिणाम प्रकाशित कर दिए जाएंगे, तो क्या सचमुच डिजिटल तकनीक से शिक्षण के पारंपरिक पद्धति को रूपांतरित किया जा सकेगा, मेरा मानना है शायद नहीं, यदि ऐसा संभव होता तो परीक्षा भी इसी माध्यम से पूरी की जा सकती थी। बच्चे विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के वातावरण में जहां अपनी मनोवैज्ञानिक भाषिक शारीरिक अंतर स्नेही संवादों के मध स्वयं भौगोलिक मैं ज्ञान को नवसृजित कहते हैं, परंतु डिजिटल माध्यम ज्ञान की पारंपरिक सृजनशीलता के उपमानो को प्रतिपुष्टि नहीं कर सकता। इसी संदर्भ में स्वयं को संयमित रखना चेतना ओ के नव संचार में पारिवारिक मूल्यों को आत्मसात करनी चाहिए।

ऑनलाइन कक्षाओं से छात्रों के नॉलेज में कोई कमी नहीं आती है ,लेकिन छात्रों के कैंपस माहौल नहीं मिलने के कारण बाहरी एक्सपोजर, सोचने की क्षमता और प्रेजेंटेशन कला का विकास नहीं होता है घर पर बैठकर ऑनलाइन कक्षा में सम्मिलित होने से प्रैक्टिकल कार्य प्रभावित होता है ट्रेनिंग और रिफ्रेशर प्रोग्राम्स के माध्यम से छात्रों में सीखने का जज्बा अपनी कमियों को दूर करने की कला विकसित हो जाती है ।स्कूल विकास नहीं होने का कारण छात्रों के भविष्य पर असर पड़ सकता है।

ऑनलाइन शिक्षण में प्रोफेशनल पाठ्यक्रम ज्यादा प्रभावित हुए हैं ।छात्रों को नॉलेज तो मिल जाता है लेकिन प्रैक्टिकल नॉलेज में असुविधा होती है। यही कारण है कि ऐसे पाठ्यक्रम से जुड़े विद्यार्थी को जॉब मिलने में कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। ऑनलाइन क्लासेज में छात्रों को क्लास जैसा वातावरण नहीं मिल पा रहा है। लंबे समय तक मोबाइल लैपटॉप इस्तेमाल करने से उनकी स्वास्थ्य पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।

ऑनलाइन क्लासेस में थ्योरी पढ़ने में इतनी समस्या नहीं होती जितने प्रैक्टिकल सब्जेक्ट में परेशानी आती है। ऑनलाइन शिक्षण में सिलेबस खत्म करने पर ज्यादा जोर दिया जाता है जिससे छात्रों को डाउट क्लियर नहीं हो पाते है। ऐसे में सरकार को छात्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कॉलेज व विश्वविद्यालय में ऑफलाइन पठन-पाठन की सुरक्षित उपाय की तरफ बढ़ना चाहिए। जिससे छात्र कैंपस माहौल में कौशल संवाद के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी हासिल कर सके।


लेख: रूपशी भारती